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Fábio Araújo
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Sunday 22 October 2023 13:52:45 GMT
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जय कपीश तिहु लोक उजागर ॥ १ ॥ रामदूत अतुलित बलधामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥ २ ॥ महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥ कंचन वरण विराज सुवेशा । कानन कुंडल कुंचित केशा ॥ ४ ॥ हाथवज्र औ ध्वजा विराजै । कांधे मूंज जनेऊ साजै ॥ ५ ॥ शंकर सुवन केसरी नंदन । तेज प्रताप महा जग वंदन ॥ ६ ॥ विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । रामलखन सीता मन बसिया ॥ ८ ॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरि लंका जलावा ॥ ९ ॥ भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचंद्र के काज संवारे ॥ १० ॥ लाय संजीवन लखन जियाये । श्री रघुवीर हरषि उर लाये ॥ ११ ॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरत-सम भाई ॥ १२ ॥ सहस्र वदन तुम्हरो यश गावै । अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥ १३ ॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद शारद सहित अहीशा ॥ १४ ॥ यम कुबेर दिगपाल जहां ते । कवि कोविद कहि सके कहां ते ॥ १५ ॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥ १६ ॥ तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥ १७ ॥ जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ १८ ॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥ दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २० ॥ राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥ सब सुख लहै तुम्हारी शरना । तुम रक्षक काहू को डर ना ॥ २२ ॥ आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तें कांपै ॥ २३ ॥ भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥ नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत वीरा ॥ २५ ॥ संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥ २६ ॥ सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥ और मनोरथ जो कोई लावै । तासु अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥ चारों जुग प्रताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ २९ ॥ साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ ३० ॥ अष्टसिद्धि नव निधि के दाता । अस वर दीन्ह जानकी माता ॥ ३१ ॥ राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥ तुम्हरे भजन राम को पावै । जन्म जन्म के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥ अंत काल रघुपति पुर जाई । जहां जन्म हरिभक्त कहाई ॥ ३४ ॥ और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥ ३५ ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥ जय जय जय हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ ३७ ॥ जो शत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥ ३८ ॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीशा ॥ ३९ ॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महं डेरा ॥ ४० ॥
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जय कपीश तिहु लोक उजागर ॥ १ ॥ रामदूत अतुलित बलधामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥ २ ॥ महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥ कंचन वरण विराज सुवेशा । कानन कुंडल कुंचित केशा ॥ ४ ॥ हाथवज्र औ ध्वजा विराजै । कांधे मूंज जनेऊ साजै ॥ ५ ॥ शंकर सुवन केसरी नंदन । तेज प्रताप महा जग वंदन ॥ ६ ॥ विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । रामलखन सीता मन बसिया ॥ ८ ॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरि लंका जलावा ॥ ९ ॥ भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचंद्र के काज संवारे ॥ १० ॥ लाय संजीवन लखन जियाये । श्री रघुवीर हरषि उर लाये ॥ ११ ॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरत-सम भाई ॥ १२ ॥ सहस्र वदन तुम्हरो यश गावै । अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥ १३ ॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद शारद सहित अहीशा ॥ १४ ॥ यम कुबेर दिगपाल जहां ते । कवि कोविद कहि सके कहां ते ॥ १५ ॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥ १६ ॥ तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥ १७ ॥ जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ १८ ॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥ दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २० ॥ राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥ सब सुख लहै तुम्हारी शरना । तुम रक्षक काहू को डर ना ॥ २२ ॥ आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तें कांपै ॥ २३ ॥ भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥ नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत वीरा ॥ २५ ॥ संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥ २६ ॥ सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥ और मनोरथ जो कोई लावै । तासु अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥ चारों जुग प्रताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ २९ ॥ साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ ३० ॥ अष्टसिद्धि नव निधि के दाता । अस वर दीन्ह जानकी माता ॥ ३१ ॥ राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥ तुम्हरे भजन राम को पावै । जन्म जन्म के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥ अंत काल रघुपति पुर जाई । जहां जन्म हरिभक्त कहाई ॥ ३४ ॥ और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥ ३५ ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥ जय जय जय हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ ३७ ॥ जो शत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥ ३८ ॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीशा ॥ ३९ ॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महं डेरा ॥ ४० ॥

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